सहकारिता आंदोलन भारत के ग्रामीण समाज की प्रगति भी करेगा और एक नई सामाजिक पूंजी की अवधारणा भी खड़ी करेगा - अमित शाह

सहकारिता आंदोलन भारत के ग्रामीण समाज की प्रगति भी करेगा और एक नई सामाजिक पूंजी की अवधारणा भी खड़ी करेगा - अमित शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह आज नई दिल्ली में आयोजित ‘राष्ट्रीय सहकारिता सम्मेलन’ में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर सहकारिता से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने देश के पहले सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह का स्वागत किया। कार्यक्रम में केन्द्रीय सहकारिता राज्य मंत्री श्री बी. एल. वर्मा, इंटरनैशनल कोआपरेटिव एलांयस (ग्लोबल) के अध्यक्ष डॉ. एरियल ग्वार्को, सहकारिता मंत्रालय व कृषि तथा किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव और भारत की अग्रणी सहकारी संस्थाओं- इफ़्को, भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ, अमूल, सहकार भारती, नैफेड और कृभको समेत समस्त सहकारी परिवार के अनेक गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे।

केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री ने देशभर से आए 2100 से अधिक सहकारी बंधुओं और वर्चुअल माध्यम से देश-विदेश से जुड़े करीब 6 करोड़ लोगों को अपने संबोधन की शुरूआत पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय की नीति के उल्लेख के साथ की। श्री अमित शाह ने कहा कि ग़रीब कल्याण और अंत्योदय की कल्पना सहकारिता के बिना हो ही नहीं सकती और देश में पहले जब भी विकास की बात होती थी तब सबसे पहले पंडित दीनदयाल जी ने अंत्योदय की बात की और आज उनका जन्मदिन लाखों-करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा प्राप्त करने का दिन है।

अमित शाह ने कहा कि आज़ादी के 75 सालों के बाद और ऐसे समय पर जब सहकारिता आंदोलन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, उस समय देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वतंत्र सहकारिता मंत्रालय बनाया। उन्होंने देशभर के करोड़ों सहकारिता कार्यकर्ताओं की ओर से सहकारिता आंदोलन का गठन करने के लिए प्रधानमंत्री जी का धन्यवाद व्यक्त किया और कहा कि देश का पहला सहकारिता मंत्री बनना उनके लिए बहुत गौरव की बात है। श्री शाह ने सहकारिता मंत्री के रूप में देशभर के सहकारिता नेताओं और कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि अब उपेक्षा का समय समाप्त हो गया है और प्राथमिकता का समय शुरू हुआ है और सब मिलकर सहकारिता को आगे बढ़ाएं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि देश के विकास में सहकारिता बहुत महत्वपूर्ण योगदान देती है और ये योगदान आज भी है, लेकिन अब भी कई आयामों तक पहुंचना अभी बाक़ी है। उन्होंने कहा कि इसके बारे में नए सिरे से सोचना होगा, नए सिरे से रेखांकित करना होगा, हमारे काम का दायरा बढ़ाना होगा, काम में पारदर्शिता लानी होगी, और काम में सहकारिता की भावना को स्वभाव और संस्कार की तरह शामिल कर सहकारिता के आंदोलन को आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि देश के करोड़ों किसानों, वंचितों, पिछड़ों, दलितों, ग़रीबों, उपेक्षितों, महिलाओं के विकास का मार्ग केवल सहकारिता के माध्यम से ही प्रशस्त हो सकता है।

अमित शाह ने कहा कि कई लोग सहकारिता की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं और उन्हें लगता है कि सहकारिता आंदोलन अब अप्रासंगिक हो गया है, लेकिन सहकारिता आंदोलन सबसे ज़्यादा प्रासंगिक आज है और लंबा सफ़र अभी बाक़ी है। उन्होंने कहा कि हर गांव को कोऑपरेटिव के साथ जोड़कर, सहकार से समृद्धि के मंत्र से हर गांव को समृद्ध बनाना और इसके ज़रिए देश को समृद्ध बनाना, यही सहकारिता आंदोलन की भूमिका होती है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि सहकारिता शब्द, ‘सह’ और ’कार्य’ शब्दों से मिलकर बना है, मिलजुलकर, एक लक्ष्य के साथ, बंधुत्व भाव से एक दिशा में काम करना ही सहकारिता है। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि सहकारिता क्षेत्र में काम करने वाले हम सब लोगों की ताक़त और आर्थिक शक्ति कम हो, लेकिन हमारी संख्या इतनी अधिक है कि अगर इसे कोऑपरेटिव के माध्यम से एकत्र करते हैं तो एक प्रचंड ताक़त का निर्माण होता है, जिसे कोई हरा नहीं सकता। श्री शाह ने कहा कि अब आत्मविश्वास के साथ सहकारिता आंदोलन में एक नई शुरूआत करने का समय आ गया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक मंत्र दिया है, सहकार से समृद्धि का, और उन्होंने जो पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का एक लक्ष्य रखा है, सहकारिता क्षेत्र भी इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए पूरा ज़ोर लगा देगा।

अमित शाह ने कहा कि सहकारिता आंदोलन भारत के ग्रामीण समाज की प्रगति भी करेगा और एक नई सामाजिक पूंजी की अवधारणा भी खड़ी करेगा। उन्होंने कहा कि पूंजी की दुनिया में कई व्याख्याएं हैं, लेकिन हम 10,000 साल की संस्कृति का वहन करने वाले लोग हैं और सामाजिक पूंजी का विचार हमारे सहकारिता आंदोलन को बहुत आगे ले जाएगा। श्री शाह ने कहा कि भारत की जनता के स्वभाव में सहकारिता घुलमिल गई है और संस्कार में सहकारिता है और ये कोई उधार लिया हुआ विचार (Concept) नहीं है, इसीलिए भारत में सहकारिता आंदोलन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकता।

केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री ने कहा कि वो लगभग 25 वर्षों से सहकारिता आंदोलन से जुड़े हुए हैं, और देश की सहकारिता किसी परिपत्र का इंतज़ार नहीं करती बल्कि जब बाढ़ जैसी आपदा आती है तो गांव की पैक्स (PACs-Primary Agriculture Cooperative Societies) वहां खड़ी होती है और सबको खाना खिलाती है, आसरा देती है। ज़िला पैक्स सहकारी बैंक अपने मुनाफ़े या डिविडेंड की चिंता नहीं करता बल्कि अपने कार्यक्षेत्र में, चाहे अकाल हो या तूफ़ान हो या बाढ़ हो, काम करने के लिए सभी तैयार हो जाते हैं। सहकारी आंदोलन ने इस देश को कई संकटों से बाहर निकालने में अपना योगदान दिया है। सहकारिता भारत के लिए नई नहीं है और वर्ष 1904 से लेकर आज तक सहकारिता ने कई नए मुक़ाम हासिल किए हैं, कई उतार-चढ़ाव भी देखे हैं, कभी गिरे, कभी संभले, कभी आगे बढ़े, लेकिन इसकी गति नहीं रुकी और आप सबसे यही अनुरोध है कि ये गति नहीं रुकनी चाहिए।

अमित शाह ने अपने संबोधन में सहकारिता आंदोलन को बल देने वाले, माधवराव गोडबोले, बैकुंठभाई मेहता, त्रिभुवनदास पटेल, विट्ठलराव विखे पाटिल, यशवंतराव चव्हाण, धनंजयराव गाडगिल, और लक्ष्मणराव इनामदार जैसे कई लोगों को याद और नमन किया।

केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री ने कहा कि कई लोग उनसे पूछते हैं कि क्या सहकारिता आंदोलन आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने सहकारी आंदोलन की अच्छी बातों के बारे में बताते हुए गुजरात के अमूल का ज़िक़्र किया और कहा कि अमूल का जन्म सरदार पटेल की दीर्घदृष्टि से हुआ। उन्होंने कहा कि 1946 में अंग्रेज़ों ने एक फ़ैसला किया कि किसानों को अनिवार्य रूप से अपना सारा दूध एक निजी कंपनी को देना होगा। इसके ख़िलाफ़ खेड़ा ज़िले में एक आंदोलन हुआ और सरदार पटेल ने त्रिभुवनभाई को कहा कि जब तक दूध बेचने की व्यवस्था नहीं होती, तब तक इसके ख़िलाफ़ आंदोलन सफल नहीं हो सकता और वहीं से अमूल की शुरूआत हुई। सरदार पटेल के मार्गदर्शन में त्रिभुवनभाई पटेल ने दो प्राथमिक ग्राम दुग्ध उत्पादक समितियों का पंजीकरण किया जिसमें 80 किसान जुड़े और वो अमूल आज कहां है। वर्ष 2020-21 में अमूल का ग्रुप टर्नओवर 53 हज़ार करोड़ रूपए को पार कर गया है और 36 लाख किसान परिवार इससे जुड़े हुए हैं, विशेषकर महिलाओं को सशक्त करने का काम इसने किया है। बड़ी से बड़ी कॉर्पोरेट डेयरी जो नहीं कर सकती, वो हमारे अमूल ने किया है। इसी प्रकार लिज्जत पापड़ का ज़िक़्र करते हुए श्री अमित शाह ने कहा कि 1959 में जसवंतीबेन पोपट नाम की एक साहसी गुजराती महिला ने 80 बहनों को साथ लेकर पापड़ बनाने की एक कोआपरेटिव कि शुरूआत की थी, और वर्ष 2019 में उनका कारोबार 1600 करोड़ रूपए से अधिक का था और 80 करोड़ रूपए का निर्यात करती हैं। आज लगभग 45,000 महिलाएं लिज्जत के कोऑपरेटिव आंदोलन से जुड़ी हैं और ये सक्सेस स्टोरी देशभर की महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्त्रोत है। आज अमूल और लिज्जत की सफलता में देश की महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान है।

उन्होंने कहा कि इफ़्को ने इस देश की हरित क्रांति को एक नई दिशा देने का काम किया है। वर्ष 1967 में 57 कोऑपरेटिव्स के साथ एक सोसायटी बनी और वो बढ़ते-बढ़ते आज 36,000 से ज़्यादा कोऑपरेटिव को सदस्य बनाकर लगभग 5.5 करोड़ किसानों को उनका लाभांश पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि एक बहुत बड़ी कंपनी अगर कुछ कमाएगी तो उसका सबसे बड़ा हिस्सा उसके मालिक़ के पास जाएगा, लेकिन इफ़्को जो कुछ भी कमाएगी उसकी पाई-पाई 5.5. करोड़ किसानों के घर में जाएगी और इसी को कोऑपरेटिव कहते हैं। श्री अमित शाह ने नैनोटेक्नोलॉजी को ज़मीन पर उतारने के लिए इफ़्को की प्रशंसा की। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले दिनों में, कोआपरेटिव संस्थाओं के माध्यम से ही, उर्वरक और खाद आयात करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और हम आत्मनिर्भर बनेंगे। इसी प्रकार कृभको भी 9,500 समितियों का एक संघ है और इसकी शेयर पूंजी लगभग 388 करोड़ रूपए है और शेयरधारकों को एक वर्ष में 2118 करोड़ रूपए का लाभांश कृभको ने दिया है। उन्होंने कहा कि सफलता की कहानियों की ये सूची बहुत लंबी है जिन्होंने सहकारी आंदोलन के माध्यम से छोटे-छोटे लोगों से पूंजी इकट्ठा करके देश के अर्थतंत्र और विकास में कितना बड़ा योगदान दिया है और सारा मुनाफ़ा छोटे-छोटे निवेशकों के घरों में जाता है।

अमित शाह ने कहा कि अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है जैसे कि बीज के क्षेत्र में कोऑपरेटिव का योगदान हो सकता है और बीज को बाहर से लाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। श्री शाह ने सफल कोऑपरेटिव का आह्वान करते हुए कहा कि एक-एक क्षेत्र में अगर विस्तारीकरण किया जाए तो 5 साल में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं होगा जहां कोऑपरेटिव की पैठ नहीं होगी और ये सहकारिता मंत्रालय कोऑपरेटिव संस्थाओं को मज़बूत करने, उनमें पारदर्शिता लाने, उनका आधुनिकीकरण करने, कम्प्यूटरीकृत करने और स्पर्धा में टिक सकने वाली कोऑपरेटिव तैयार करने के लिए ही बनाया गया है। श्री शाह ने कहा कि जिस प्रकार जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी ताक़त का अहसास कराया था, उसी प्रकार कोऑपरेटिव संस्थाओं को उनकी ताक़त से परिचय कराने का वक़्त है। उन्होंने कहा कि आज देश में लगभग 91% गांव ऐसे हैं, जहां कोई न कोई कोऑपरेटिव संस्था काम करती है, दुनिया में कहीं ऐसा नहीं है। 8,55,000 से ज़्यादा पंजीकृत सहकारी समितियां हैं और साढ़े आठ लाख से ज़्यादा क्रेडिट सहकारी समितियां हैं, ऋण ना देने वाली सहकारी समितियों की संख्या 60 लाख से ज़्यादा है, 17 से ज़्यादा राष्ट्रीय स्तर के सहकारी संघ हैं, 33 राज्यस्तरीय सहकारी बैंक हैं, 363 ज़िलास्तरीय सहकारी बैंक हैं। एक तरह से हर दसवें गांव पर एक पैक्स है जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है और इन पैक्‍स के माध्यम से किसान कल्याण किया जा सकता है। सरकार द्वारा भेजे गए ऋण को पारदर्शी रूप से किसान तक पहुंचाने का काम पैक्स द्वारा किया जाता है। यह पैक्स ही खेती के लिए उपयोगी चीजों को किसानों तक पहुंचाने का माध्यम है और इस पैक्स को मजबूत करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि कृषि ऋण वितरण का 29% कोऑपरेटिव व्यवस्था से जाता है, उर्वरक वितरण 35% कोऑपरेटिव करता है, लगभग 30% खाद का उत्पादन करता है, चीनी का उत्पादन 31% सरकारी कोऑपरेटिव सरकारी मिलें करती है, दूध की ख़रीद और उत्पादन 20%, गेहूं की 13% ख़रीद कॉपरेटिव करती है, धान की 20 प्रतिशत ख़रीद कोऑपरेटिव करती हैं और मछलीपालन के क्षेत्र में भी कोऑपरेटिव का योगदान 21% है। उन्होंने कहा कि आज एक बहुत मजबूत प्लेटफार्म पर हम खड़े हैं और अब समय आ गया है, नए लक्ष्य तय करना और नए लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिए हम आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि ये जो मंच भारत के सहकारी आंदोलन के पुरखों ने हमें दिया है, उस पर एक मज़बूत बहुमंजिला इमारत बनाने का काम सभी सहकारी कार्यकर्ताओं का है और इसीलिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने सहकारिता आंदोलन को गति देने के लिए सहकारिता मंत्रालय की रचना की है।

केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री ने कहा कि हमारी सफलता चार चीजों पर निर्भर हो सकती है, संकल्प शक्ति, साफ नियत, परिश्रम और संघ भाव से काम करना और अगर हम अपने कोऑपरेटिव में इन चार मूल सिद्धांतों को शामिल करते हैं तो हम अपने आंदोलन को बहुत बड़ी गति देंगे। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने जो सहकारिता मंत्रालय बनाया है उसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में विकास को पहुंचाना और ग्रामीण क्षेत्र में हर वंचित तक विकास को पहुंचाने की चुनौती को पार करने के लिए सहकारिता मंत्रालय निरंतर कार्य करेगा। उन्होंने कहा कि इसे एक स्वदेशी यंत्रणा बनाने की जिम्मेदारी भी सहकारिता मंत्रालय की है। श्री शाह ने कहा कि कृषि क्षेत्र में सात साल में प्रधानमंत्री जी आमूलचूल परिवर्तन लाए हैं और अगर सिर्फ बजटीय आवंटन की बात करें, तो वर्ष 2009-10 में कृषि का बजट 12000 करोड रूपए था, और वर्ष 2020-21 में इस बजट को बढ़ाकर एक लाख 34 हजार 499 करोड़ रुपए किया गया है। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र नरेन्द्र मोदी सरकार की प्राथमिकता है और कृषि क्षेत्र की यह जो प्राथमिकता है उसको उसके लक्ष्य तक पहुंचाना सहकारिता के बगैर संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि हमने बहुत सारे किसानों को समर्थन देने की बात कही है। स्वामीनाथन आयोग आया और तब से बात हो रही है कि किसानों की आय बढ़नी चाहिए, लागत से 50% ज्यादा होना चाहिए लेकिन कोई नहीं देता था। पहली बार नरेन्द्र मोदी सरकार ने लागत से ज्यादा एमएसपी तय करके किसानों को फायदा पहुंचाने का काम किया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना द्वारा देश के 11 करोड़ किसानों को 1,58,000 करोड़ रूपये सीधे डीबीटी के माध्यम से पहुंचाया गया। स्टार्टअप शुरू करने का नया अभियान चलाया गया, 10,000 नए FPO बनाए गए हैं, लगभग 6,865 करोड रुपए वित्तपोषण के लिए अलग से खर्च किया जाना है, ई-नाम मंडी योजना लाए हैं, सॉइल हेल्थ कार्ड दिया है और इन सब में सहकारी क्षेत्र और पैक्स की भूमिका है। श्री अमित शाह ने कहा कि पैक्स में सभी बातों का अध्य्यन करके, इसकी कार्यान्वयन ऐजेंसी ग्रामस्तर पर बनाने की सुरूआत करनी होगी, तभी ये सारी चीज़ें नीचे तक पहुंचेंगी।

केन्द्रीय सहकारिता मंत्री ने कहा कि कई लोग कहते हैं कि सहकारिता राज्य का विषय है, लेकिन श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार का सहकारिता मंत्रालय, सब राज्यों के साथ सहकार करके चलेगा और ये किसी से संघर्ष करने के लिए नहीं बना है और इसीलिए किसी को यह सोचने की जरूरत है नहीं है कि यह राज्य का विषय है या केंद्र का है। हम सब राज्यों की मदद करेंगे, सबको साथ में लेंगे और आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे। सहकारी समितियों को ज़मीनी स्तर तक पहुंचाने का काम सहकारिता मंत्रालय के तत्वाधान में होगा। बहुराज्यीय कोऑपरेटिव को सुगम बनाने के लिए हम जल्द ही एक्ट में बहुत सारे बदलाव लेकर आएंगे।

अमित शाह ने कहा कि वर्ष 2002 में अटल जी सहकार नीति लेकर आए थे और अब 2021-22 में मोदी जी कुछ समय के अंदर नई सहकार नीति लेकर आएंगे। उन्होने कहा कि आजादी के 75 साल में अमृत महोत्सव में नई सहकार नीति को बनाने की शुरुआत करेंगे, पैक्स को मजबूत करने का काम होगा। 65,000 पैक्‍स 6 लाख गांव के बीच में कम है और लक्ष्य रखा जाएगा कि आने वाले 5 साल के अंदर हर दूसरे गांव में पैक्स हो जाए और यह संख्‍या 65,000 से बढ़ाकर तीन लाख तक पहुंचाने के लिए उचित कानूनी खाका तैयार करने का काम सहकारिता मंत्रालय करेगा। श्री शाह ने कहा कि यह एडवाइजरी होगा जो राज्य के पास भेजा जाएगा और राज्य उसमें अपने अनुसार परिवर्तन कर पैक्‍स बनाने में सहयोग करेंगे। श्री अमित शाह ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी पैक्स का कंप्यूटराइजेशन हो जिसमें भारत सरकार भी अपना बड़ा योगदान देने वाली है। ऐसा सॉफ्टवेयर भी बना लिया जाएगा जो टैक्स, डीसीबी, नाबार्ड तीनों को जोड़ेगा, एक ही पैक्‍स से तीनों का काउंटिंग सिस्टम स्‍वभाषा में, स्थानीय भाषा में होगा। पैक्स का एफपीओ बनाने के लिए क्या किया जा सकता है इस पर भी सहकारिता मंत्रालय काम कर रहा है। श्री शाह ने बताया कि सहकारिता प्रशिक्षण को और पैना किया जाएगा। प्रोफेशनल बनाना पड़ेगा और स्किल डेवलपमेंट की व्यवस्था की जाएगी। क्रेडिट सोसायटियों की भूमिका और मजबूत की जाएगी जिससे छोटे से छोटा व्यक्ति भी क्रेडिट पा सके। उन्होने कहा कि सहकारिता मंत्रालय सभी प्रायरिटी सेक्टर लेंडिंग में कोआपरेटिव की भूमिका बढ़ाने के लिए सभी मंत्रालयों के साथ काम कर प्रायोरिटी लैंडिंग सुनिश्चित करेगा। अमूल की तर्ज पर स्व-सहायता समूह अपनी सोसाइटी बनाकर काम कर सके इसके लिये विशेष कानूनी प्रबंधन की जरूरत है जिस पर काम किया जा रहा है। मछुआरा सहकारिता के लिए काम किया जाएगा ताकि छोटे मछुआरे भी बड़ी बड़ी चीजें ले सकें और उसका मुनाफा सीधे मछुआरा के बैंक अकाउंट में पहुंचे। वन उत्पादन के लिए भी जनजातीय सहकारिता बनाकर काम किया जाएगा।

अमित शाह ने कहा कि केंद्र सरकार सभी राज्यों के साथ सहकारिता के क्षेत्र में मिलकर काम करे इस तरह का प्रयास किया जाएगा। श्री शाह ने कहा कि सहकारिता को आगे बढ़ाने के लिए ट्रेनिंग, स्किल डेवलपमेंट, भर्ती और चुनाव में पारदर्शिता लानी होगी वरना हम कालबाहय हो जाएँगे।उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने सहकारिता क्षेत्र के लिए जो इतना बड़ा निर्णय लिया है उसे गति प्रदान करने के लिए हमें आंतरिक परिवर्तन और आत्मनिरीक्षण करना होगा। श्री शाह ने कहा कि सहकारिता मंत्रालय कॉमन सर्विस सेंटर बनाने और डेटा बेस तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। साथ ही एक राष्ट्रीय सहकारिता पहल (National Cooperative Initiative) की ज़रूरत है और किसी सहकारी संस्थान को इसके लिए आगे आना चाहिए। श्री शाह ने कहा कि आज नेशनल कोऑपरेटिव यूनिवर्सिटी बनाने की भी आवश्यकता है।

अमित शाह ने कहा कि मैं अर्बन कोऑपरेटिव बैंक की समस्याओं से अवगत हूँ और विश्वास दिलाना चाहता हूं कि इस क्षेत्र के साथ कोई अन्याय नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा कि इसीलिए मोदी जी ने सहकारिता को प्राथमिकता दी है और आत्मनिर्भर भारत में सहकारिता को प्रमुख स्थान दिया है। उनका कहना था कि हम चाहते हैं सम-विकास होना चाहिए, विकास सर्व-स्‍पर्शी होना चाहिए, सर्व-समावेशी होना चाहिए, विकास के मॉडल के अंदर सब को छूने की ताकत होनी चाहिए और विकास का मॉडल सबको समाहित करने के लिए बाहें फैलाकर खड़ा होना चाहिए जो कोआपरेटिव के अलावा संभव नहीं है। इसलिए सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की गई है।

अमित शाह ने इंटरनैशनल कोआपरेटिव एलांयस (ग्लोबल) के अध्यक्ष डॉ. एरियल ग्वार्को को विश्वास दिलाते हुए कहा कि भारत का सहकारिता क्षेत्र, भारत का सहकारी आंदोलन देशभर में गुड प्रैक्टिस साझा करने, एक्सचेंज करने का एक प्लेटफॉर्म बन सकता है। उन्होंने कहा कि आप इनीशिएटिव लेकर ऐसी किसी संस्था का भारत में हेड क्वार्टर बनाइए जो दुनिया भर की गुड प्रैक्टिसेज कोपॉरेटिव, गुड प्रैक्टिस एक्सचेंज का माध्यम बने और हम आपका स्वागत करने के लिए तैयार हैं। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री जी के मन की इच्छा है कि सहकारिता के आधार पर भारत में विकास का एक नया अध्याय लिखा जाए, मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को चरितार्थ करने के लिए सहकारी क्षेत्र को इसमें प्रमुख भूमिका निभानी होगी और हमें सहकारिता को संस्कार बनाना होगा। उन्होंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि जो महत्वपूर्ण भूमिका हम निभाएंगे आने वाली कई पीढ़ियाँ उसे याद रखेंगी।